Samjhota [ Compromise ]- A poem

आज तक हमेशा सिखाया गया  - नारी का दूजा नाम समझोता.
कभी माता पिता की खातिर, या कभी समाज से डरकर, समझोता, समझोता, समझोता. क्या बस यही जिंदगी है?

क्यों बनू मैं समझोते का पुतला? क्यों करू मैं जो मेरा मन न माने? 
क्या यह मेरी गलती है जो मैं पैदा हुई औरत बनकर? या फिर इस बड़े संसार मैं जगह नहीं मेरे सपनो की?

न मांगू चाँद, न मांगू तारे - बस करना चाहू वही जो करो तुम सारे.
सुना है नामुमकिन कुछ भी नहीं; पर मैं तो करना चाहू वोही जो मुमकिन है.

क्या मैं बिना समझोते के छू सकती हु वोह सफलता क आसमान? ? 


Till today I have always been taught to accommodate. Sometimes for parents or sometimes for the fear of society. Accommodate, accommodate, accommodate.

Why should I become a puppet depicting accommodation? Why should I do something which my heart does not agree to? Is it my fault I was born as a woman? Or does this big world does not have place for my dreams?

I am not asking for stars or the moon. I just want to do what everyone does. I have heard nothing is impossible, but I just want what is possible.

Can I touch that sky of success without accommodating?

 P.S: This poem has been published in Kaleidoscope ezine's May 2012 issue.


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